Monday, 8 June 2020

रात से बातें (एक)

बचपन के दिनों में एक सपना बार बार आता था | बहुत डरावना सपना | न मैं चीख़ पाता था, न हिल डुल पाता था | लोगों को कहते सुना था की मैं म्य़ार के नीचे नहीं सोना चाहिए | मैं म्य़ार के एकदम नीचे सोता था | अगले दिन मुझे पता होता था आज फिर वही सपना आएगा पर मैं कुछ भी नहीं कर सकता था | मेरा काम था रात भर कॉफ़ खाना | उसे डरावने सपने से | वो सबसे अजीब सपना था क्यूँकी उसका कोई आकार नहीं था, मैं किसी को वो सपना बयाँ नहीं कर सकता था, उसकी शय ही कुछ ऐसी थी | आज भी मुझे उस सपने के अहसास है और आज भी मैं उस सपने को बयाँ नहीं कर सकता | उस सपने से झूझते झूझते में बड़ा होता गया और कई रातों के अभ्यास ने मुझे निशाचर बना दिया | मैं जो सोने के हज़ार प्रयास कर लूँ... पर एक तिहाई रात गुज़र जाती है मज़ाल है नींद मेरे तकिए को छु भी ले | उस सपने की सबसे खास बात यह थी की बड़ा होते होते मेरी जिंदगी में ऐसा कोई खौफ़ नहीं बचा जो मुझे डरा सके | उस सपने ने मुझे तमाम जगती रातें दी हैं, मैं इस फ़िराक में हूँ की रातों को क्या मानू? मैं सोने के प्रयास से थक गया हूँ | मैं सोना चाहता हूँ | क्या प्रेम का प्रयास 'प्रेम' हो सकता है? बिलकुल नहीं | मैं नहीं मानता | प्रेम का प्रयास और प्रेम, दो अलग बातें हैं | टूटने की आवाज़ भी नहीं आती इन दिनों | आहिस्ता आहिस्ता सब बिखर रहा है |

Wednesday, 27 May 2020

छह

मैं बहुत खुश हुआ जब मैंने अपने एकांत में उसे साथ पाया। यह कितना अजीब था | एक साल पहले तक हम अंजान थे एक दूसरे को जानते तक नहीं थे और आज मेरे साथ कोई ऐसा था जिसे मेरी परवाह थी। पहली बार मैं महसूस करता हूँ किसी का होना। ऐसा नहीं था कि मुझे प्यार करने वालों की कमी थी पर कुछेक समय पहले से किसी नए से चेहरे की तलाश थी। वो मुझे मिल गया। हम दोंनो बहुत अच्छे दोस्त बन गए पर कभी एक दूसरे को दोस्त नही कहा। कभी कभी लगता की हमारा रिश्ता अजीब ही होगा। मैं अपनी ज़िंदगी में कुछ अजीब होना सुखद महसूस करता हूँ। वक़्त के साथ हम इतने करीब हो गए कि एक दिन मैंने उसकी गोद में सर रख दिया और उसे कहा कि मुझे ज़ोर की नींद आ रही है। मैंने अपने अंदर छिपे तमाम राज़ उसे कह दिए। और फिर अचानक वो गायब हो गई..मैं छटपटा उठा, इतने इंतज़ार के बाद अभी तो वो मिली थी और कितनी और बातें उसे कहनी थी। फिर अचानक मुझे लगा की मैंने यह सब उसे क्यों कहा। क्या वो मेरी दोस्त है? प्रेमिका तो नहीं ही है, हाँ लगाव है शायद वो भी मेरे ही कारण। यह मैंने क्या कर दिया, कैसे अपने भीतर छिपे राज़ उसे कह दिए। क्या मैं हमेशा से ऐसा हूँ कि कोई मेरी परवाह करे या मुझसे लगाव रखे तो बिना उसे जाने समझे मैं उसे वे सब बातें कह दूंगा जो मेरे भीतर है। पर मैंने किसी और को भी तो कभी नहीं कहा सिर्फ उसे ही तो कहा। शायद परेशानी भी यही है कि उसे ही क्यों कहा। मैं हर मायने में उसे सोचता हूँ। ख़ुद को गलत ही पाता हूँ। शायद इस वज़ह से क्योंकि सभी शुरुआत मैंने ही की है। उसने कभी मेरी तरफ कदम नहीं बड़ाया। मेरा ही रुख़ उसकी और था। क्यों?, मैं ऐसा क्यों हूँ?, क्या सभी ऐसे है?, मतलब इस पूरी दुनिया में, कितने लोग है अनेकों चेहरे पर कोई एक ही आपकी स्मृति में बार बार क्यों आ जाता है? तब भी जब आप न चाहते हों। दरअसल, कभी कभी यह चाहना समझ नही आती। क्योंकि अगर वो आपकी स्मृति में है तो वो आपकी चाहत ही है। अब मैं एक रहस्य में उलझने लगता हूँ.. मैं उसके अलावा दुनिया की तमाम चीज़ों की कल्पना करता हूँ पूरे ब्रह्माण्ड को सोचता हूँ। उसकी व्यापकता को सोचता हूँ। हममें से कोई भी न के बराबर है। और किसी के होने से कोई फर्क़ शायद पड़ता होगा। ख़ुद में इस बारे में कुछ महसूस नही करता। फिर अचानक से वो मुझे छोड़कर जाने लगती है। मैं चीख़ने लगता हूँ आवाज़ नही निकलती। खट खट की आवाज़ लगातार मेरे कानों में गूँजती रहती है। मैं नींद से जागता हूँ। और मेरी ज़बान से निकलता है "यह क्या हो गया।", "जबकि कुछ हुआ ही नहीं।"

पाँच

"हम दोनों के बीच जो रास्ता है उसे भी तो हम दोनों ही समझ नहीं आते |" कल रात उससे बात शुरू ही की थी अचानक रुक गया। मन हुआ की अब कभी बात नहीं करूं। फिर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों सोचता हूँ? मतलब हम ख़ुद से भागकर कहाँ जायेंगे? और क्या ऐसे रास्ते बने भी है जिन्हें पार कर हम अपने से भाग जाएं। मैं तो सृजन की प्रिक्रिया में हूँ यानी ख़ुद को ढूंढ ही रहा हूँ। ख़ुद से भागना तो ख़ुद की तलाश नही होती शायद। कभी कभी अपनी यह मनोस्थिति समझ नहीं आती क्योंकि यह ख़ुद में विरोधाभास लिए हुए है। चाहने न चाहने का, भागने न भागने का, छुपने न छुपने का और हर तरह का। बहुत सोचने के बाद मुझे पता चला की मुझे किसी से भी डर नहीं लगता, किसी से भी। यह कुछ गलत सा अहसास है डर का न होना। कभी कभी लगता है कहीं मैं ठीक के आस पास तो नहीं। ओ शिट... मुझे ठीक शब्द से तो भयानक चिढ़ है जब मैं इसके आस पास भी कहीं होता हूँ तो लगता है की ख़ुद को डुबो दूं क्योंकि ये सुस्त सा अहसास दिलाता है। मैं आर या पार की लड़ाई लड़ना चाहता हूँ एक ही पल में, हमेशा। चाहता हूँ की तेरे लिए जब भी लडूं ख़ुद को तो हार ही जाऊं इस तरह बार बार हारना भी तो हर बार की बैचेनी है। शायद, बार बार या हर बार और कभी कभी का आना भी तो ठीक के आस पास कहीं होगा। मैं फिर से वहीं आ गया जहाँ खड़ा था यह क्या विडंबना है? कहीं ऐसा तो नहीं की हम दोनों में से कोई एक रहस्य हो अज़ीब सा या पहेली? मैंने जब उससे इस बात का ज़िक्र किया वो कहती है -"आप मुझे समझ नहीं आते।", "मुझे भी वो कहाँ समझ आती है", और हम दोनों के बीच जो रास्ता है उसे भी तो हम दोनों ही समझ नहीं आते। "दोनों न समझ है !"

चार

'वह' जब भी मेरी कल्पना में आती वह शांत सी स्थिर सी, ठहरी हुई नज़र आती। मैं अपनी कल्पना में उसके ठहराव का प्रेमी हूँ। पर असल जिंदगी में, मैं चलना चाहता हूँ और कभी कभी बेबज़ह, बेतहाशा भागना चाहता हूँ। कल्पना से मेरा रिश्ता यह है की वह सबसे पहले जीवन में आती है। पर असल में, मैं जीवन को आगे रखता हूँ क्योंकि मुझे चलना बहुत पसंद है। फिर चाहे मुझे किसी थामे हुए हाथ को छोड़ना पड़े। मैं सिर्फ़ उसी साथ को चाहता हूँ जो असल में चल सके। ठहराव कल्पना के बाहर बेहूदा लगता है। जीवन में ठहराव को नहीं जिया जा सकता। इसीलिए अक़्सर मैं अकेला चल पड़ता हूँ। बेपरवाह।

तीन

उस वक़्त को मैं अपनी ओर आते देख रहा था जो मेरा अपना नहीं था। वक़्त को मैंने जीवन से उधार लिया था बदले में वादा किया था कि मैं अपना जीवन उसे दे दूंगा। पर मुझे उधारी पसंद नहीं है इसलिए मैंने वक़्त को वक़्त लौटा दिया और अपने हिस्से का अकेलापन वापस ले लिया। क्योंकि अकेलेपन की गोद में बैठकर मैं ख़ुद को ज़्यादा खोज लेता हूँ। ऐसा नहीं है की ख़ुद को खोजे जाने के लिए हमेशा अकेला होना ज़रूरी है पर यह ज़रूरी है की जिसके साथ आप जीवन को खोज रहे हो या जो उस वक़्त आपके साथ है- वो ईमानदार हो। क्योंकि भरोसे पर ही तो दुनिया टिकी है। वक़्त और मेरे बीच जन्म से ही यह भरोसा कायम है तभी तो जब चाहे मैं अपने जीवन से वक़्त को उधार मांग लेता हूँ और वो मुझे मेरे अकेलेपन से दूर ले जाता है। मैं तुमसे उतना ही साथ मांग रहा हूँ जितना लौटाया जा सके। उससे तनिक भी ज़्यादा नहीं |

दो

मैं जब अपने घर से निकला तो माँ की आँखों में देख रहा था । वो चाहती थीं की विरासत में मुझे इतना कुछ दे सके की ज़िन्दगी में मुझे कभी कोई तकलीफ़ न हो । मैंने कभी माँ से कहा नहीं पर मुझे उसकी लगन हमेशा दिखती थी और मैं उसे कहना चाहता था की विरासत में यह जो मुझे मिल रहा है वो सबसे बड़ा है । यह इतना भी हो सकता है की मैं दुनिया की कोई भी बाजी जीत सकता हूँ । पापा की ज़िद रहती है की वो हमेशा मुझे कुछ दे सकें। मेरे लिए कुछ कर सकें और एक किस्म की शिद्धत  हमेशा उनके भीतर रही है। आज कल में पता नहीं ऐसा क्या घट गया की महसूस हो रहा है की विरासत में वही शिद्धत मुझे मिल गई है । जिसके बूते मैं दुनिया में कुछ भी हासिल कर सकता हूँ । मुझे अपने काम करने की शिद्धत पे घमंड हो गया है । मुझे अपने प्यार करने की शिद्धत पे घमंड हो गया है । घमंड और अकड़ बहुत विशेष लोगों में होती है। जिनके पास जीतने का जज़्बा होता है वही तो छाती ठोककर कह पाते होंगे की वे किसी दिन कर दिखाएंगे। मुझे जो चाहिए था शायद मिल गया है । मुझे विरासत में कोई धन दौलत या कोई भी भौतिकी तो कभी चाहिए ही नहीं थी । यही शिद्धत चाहिए थी जो है मुझमें । लेकिन कुछ है जो इस वक़्त मेरे भीतर बिखर गया है। जिसे समेटना मेरे अकेले के बूते की बात तो नहीं है। क्योंकि वो बिखरा हुआ मेरे अकेले का नहीं है । अपनी शिद्धत को मैं संभाल लूँगा पर मेरा घमंड नहीं टूटना चाहिए । मेरी अकड़ नहीं मरनी चाहिए । मैंने अब तक किसी भी असीम शक्ति पर भरोसा नहीं किया है लेकिन अगर वो है तो आज एक गुज़ारिश है उससे की अब से मैं अपनी शिद्धत को ही पालूँगा । पर जो बचाए रखना है वो बचा रहे । क्योंकि घमंड नहीं टूटेगा अगर कुछ टूटेगा तो वो मैं हूँ। शायद ये जीवन के सन्दर्भ में तो नहीं ही है। क्योंकि जीवन के हर उतार चढ़ाव को मैं बस जीना चाहता हूँ । यही मेरे जीवन की जीत है । और अपने सपनों के लिए भी घमंड या अकड़ का होना स्वाभाविक सा नहीं है । फिर ऐसा कुछ है जो न कहा जा सकता है, न लिखा जा सकता है !!  ये होना ठीक है या नहीं पर तय है । प्रेम पंख फैलाए मेरे कंधे आ बैठा है । पर उसका भार कभी कंधे पे महसूस नहीं होता । समझ नहीं आता की वो उड़ चुका है, बैठा है,  उड़न चाहता है या बैठना चाहता है । मैं तुम्हारा भार हमेशा अपने कंधे पर महसूस करना चाहता हूँ |

एक

बचपन में बड़े बड़े किस्से होते थे आस पास। मैं बेतहाशा भागना चाहता था। फिर, किस्से इसलिए सुनाए जाने लगे ताकि मैं भाग न सकूं। मेरे अंदर किस्सों का डर गहराता गया पर कभी मैं डरा नहीं। स्कूल के दिनों में जब सब लोग अपने घर वालों को याद कर करके रोते थे तब मैं रोया नहीं। वो सारे आँसू क़ैद हो गए । आँसूयों के क़ैद हो जाने से त्रासद कुछ नहीं होता।मेरे हिस्से आए लोगों ने कभी खुलकर प्यार जताया और खुलकर दूर छिटकने लगे। मैंने उन्हें जाने दिया। मैं सिमटते सिमटते अकेला होने लगा। एक बात जो हमेशा मैं कहना चाहता था पर कभी किसी से न कह सका। माँ से, पिता से, परिवार से, दोस्तों से, प्यार से कि वो मेरे लिए सबसे ज़्यादा महत्व रखते हैं। मुझे लगा की यह कहा नहीं जाना चाहिए। बस सिर्फ इस बात की चुप्पी हमेशा खलती है। मैं भगौड़ा था, पैदाइशी भगौड़ा। मैं अपनी नाकामियों, कमज़ोरियों से हमेशा भागा ठीक उसी तरह लोगों से नहीं भाग पाया। किस्सों की गंभीरता, आंखों में क़ैद आँसू, चुप्पी और एक भगौड़े की नाकामी दिन-व-दिन बढ़ रही है।